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आरक्षण: बराबरी का सपना या स्थायी सुविधा का सिस्टम?

देश में आरक्षण पर बात करना ऐसा है जैसे बारूद के ढेर पर अगरबत्ती जलाना—खुशबू कम, धुआँ ज़्यादा उठता है। इरादा कभी बहुत साफ था—जो पीछे रह गए, उन्हें आगे लाना। लेकिन आज ये कहानी थोड़ी बदल गई है। अब ये “सहारा” कम और “सिस्टम” ज़्यादा लगता है, जहाँ पहुँच वही रहे हैं जिन्हें रास्ता पहले से पता है। सबसे पहले “क्रीमी लेयर” का हाल देखिए। ये वो वर्ग है, जो एक बार ऊपर उठ गया, लेकिन हर पीढ़ी में खुद को “नीचे” ही साबित करता रहता है। मतलब सीढ़ी से ऊपर चढ़ गए, फिर नीचे खड़े लोगों को देखकर बोले—“भाई, हम भी यहीं के हैं, हमें भी मौका चाहिए।” और जो सच में नीचे खड़ा है, वो सोचता रह जाता है—“मेरी बारी कब आएगी?” कई विचारकों ने इस पर तंज कसा है। B. R. Ambedkar ने खुद कहा था कि आरक्षण स्थायी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए, बल्कि एक समयसीमा के साथ खत्म होना चाहिए। Periyar E. V. Ramasamy ने भी बराबरी की बात करते हुए सामाजिक सुधार को प्राथमिकता दी थी, न कि सिर्फ कोटे को। और Ram Manohar Lohia ने चेताया था कि अगर असमानता को ठीक करने के उपाय ही नए तरह की असमानता पैदा करें, तो समाज और उलझ जाएगा। अब जरा उस मशहूर लाइन को याद ...

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