आज के दौर की मंथरा..
(एक व्यंग्यात्मक विश्लेषण) Manthara का नाम आते ही अक्सर एक ऐसी छवि उभरती है, जो “कान भरने” की कला में निपुण है—बिना शोर किए विचारों का रुख बदल देना। लेकिन जरा कल्पना कीजिए, अगर मंथरा आज के डिजिटल युग में होती तो उसका रूप कैसा होता? शायद वह किसी महल की दासी नहीं, बल्कि एक “नैरेटिव मैनेजर”, “इन्फ्लुएंसर” या “व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी” की टॉपर होती—जहाँ शब्दों से ज्यादा असर संकेतों और आधे-अधूरे सच का होता है। आज की मंथरा सीधे कुछ कहने के बजाय “सिर्फ एक सवाल” पूछती—“आपने कभी सोचा है कि…?” और फिर शुरू होता शंकाओं का सिलसिला। वह प्रमाण नहीं देती, बल्कि संदर्भ देती है; तथ्य नहीं, बल्कि “ऐसा सुना है” का सहारा लेती है। उसकी ताकत यह नहीं होती कि वह झूठ बोलती है, बल्कि यह कि वह सच के बीच ऐसी जगह चुनती है जहाँ संदेह सबसे ज्यादा पनपता है। Kaikeyi के कान भरने का उसका तरीका आज शायद “ब्रेकिंग न्यूज” या “वायरल फॉरवर्ड” के रूप में सामने आता—जहाँ संदेश का उद्देश्य सूचना देना कम और भावनाओं को उकसाना ज्यादा होता। वह सीधे विरोध नहीं कराती, बल्कि धीरे-धीरे विश्वास की दिशा मोड़ देती है। पहले वह तुलना कराएगी...