प्रेस की आजादी पर सवाल?
डिजिटल लोकतंत्र में असली चुनौती खबरों को रोकना भर नहीं, बल्कि यह तय करना भी है कि कौन-सी सूचना सामने आएगी, उसकी जांच कौन करेगा और सत्ता से सवाल पूछने की कीमत कौन चुकाएगा। आज किसी घटना को दुनिया के सामने लाने के लिए किसी बड़े अखबार के संपादक या टेलीविजन चैनल के कैमरे का इंतजार करना जरूरी नहीं है। किसी गांव का नागरिक, विश्वविद्यालय का छात्र, स्थानीय पत्रकार या स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर अपने मोबाइल फोन से ऐसा वीडियो साझा कर सकता है, जो कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन जाए। भारत में समाचार देखने और समझने का माध्यम भी तेजी से बदला है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की Digital News Report 2026 के अनुसार, उसके भारतीय सर्वेक्षण में लगभग 58 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने YouTube को समाचार का स्रोत बताया। रिपोर्ट यह भी बताती है कि ऑनलाइन समाचार और वीडियो आधारित सोशल मीडिया ने पारंपरिक मीडिया के साथ-साथ समाचार पाने के नए रास्ते खोले हैं। हालांकि, इस सर्वेक्षण का नमूना मुख्यतः अंग्रेजी बोलने वाले उत्तरदाताओं पर आधारित है, इसलिए इसे पूरे भारत की आबादी का प्रतिनिधि आंकड़ा नही...