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विज्ञान, वाणिज्य और कला: संगम जिसमे दुनिया छिपी है !

किसी भी समाज की प्रगति को केवल तकनीक, केवल बाज़ार या केवल अभिव्यक्ति से नहीं मापा जा सकता। इतिहास गवाह है कि जब-जब विज्ञान की समझ, वाणिज्य की व्यवस्था और कला की संवेदना एक साथ आई हैं, तभी कोई विचार समाज का हिस्सा बन पाया है। इन तीनों में से किसी एक का वर्चस्व अक्सर असंतुलन पैदा करता है। उदाहरण सामने है। आधुनिक शहरों की ऊँची इमारतें विज्ञान की देन हैं—संरचनात्मक इंजीनियरिंग के बिना वे संभव नहीं। पर अगर वही इमारतें मानवीय ज़रूरतों, रोशनी, हवा और सौंदर्य को नज़रअंदाज़ कर दें, तो वे रहने की जगह नहीं, बोझ बन जाती हैं। जब वास्तुकला में कला जुड़ती है और वाणिज्य टिकाऊ मॉडल देता है, तब शहर रहने योग्य बनते हैं, सिर्फ़ दिखने योग्य नहीं। डिजिटल तकनीक ने संचार को क्रांतिकारी रूप से बदला। स्मार्टफोन इसका उदाहरण है। इसके भीतर का विज्ञान अत्यंत जटिल है, पर उसकी सफलता का कारण केवल तकनीक नहीं। वाणिज्य ने उसे सुलभ बनाया, किस्तों, बाज़ार और सेवाओं के ज़रिए। कला ने उसे मानवीय स्पर्श दिया—डिज़ाइन, इंटरफ़ेस और अनुभव के रूप में। तीनों का संतुलन न होता, तो यह उपकरण हमारी दिनचर्या का हिस्सा नहीं बन पाता। स्वास...

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