विज्ञान, वाणिज्य और कला: जब संगम बनता है तब सभ्यता आगे बढ़ती है
किसी भी समाज की प्रगति को केवल तकनीक, केवल बाज़ार या केवल अभिव्यक्ति से नहीं मापा जा सकता। इतिहास गवाह है कि जब-जब विज्ञान की समझ, वाणिज्य की व्यवस्था और कला की संवेदना एक साथ आई हैं, तभी कोई विचार समाज का हिस्सा बन पाया है। इन तीनों में से किसी एक का वर्चस्व अक्सर असंतुलन पैदा करता है।
उदाहरण सामने है। आधुनिक शहरों की ऊँची इमारतें विज्ञान की देन हैं—संरचनात्मक इंजीनियरिंग के बिना वे संभव नहीं। पर अगर वही इमारतें मानवीय ज़रूरतों, रोशनी, हवा और सौंदर्य को नज़रअंदाज़ कर दें, तो वे रहने की जगह नहीं, बोझ बन जाती हैं। जब वास्तुकला में कला जुड़ती है और वाणिज्य टिकाऊ मॉडल देता है, तब शहर रहने योग्य बनते हैं, सिर्फ़ दिखने योग्य नहीं।
डिजिटल तकनीक ने संचार को क्रांतिकारी रूप से बदला। स्मार्टफोन इसका उदाहरण है। इसके भीतर का विज्ञान अत्यंत जटिल है, पर उसकी सफलता का कारण केवल तकनीक नहीं। वाणिज्य ने उसे सुलभ बनाया, किस्तों, बाज़ार और सेवाओं के ज़रिए। कला ने उसे मानवीय स्पर्श दिया—डिज़ाइन, इंटरफ़ेस और अनुभव के रूप में। तीनों का संतुलन न होता, तो यह उपकरण हमारी दिनचर्या का हिस्सा नहीं बन पाता।
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी यही सच दिखता है। कोई दवा प्रयोगशाला में सफल हो सकती है, लेकिन जब तक वह सस्ती, उपलब्ध और समाज की संस्कृति के अनुकूल नहीं होती, तब तक उसका प्रभाव सीमित रहता है। विज्ञान इलाज खोजता है, वाणिज्य उसे पहुँचाता है और कला—संवाद, भाषा और भरोसे के ज़रिए—उसे स्वीकार्य बनाती है। महामारी के समय यह अंतर साफ़ दिखा: जहाँ संवाद और संवेदना की कमी रही, वहाँ अविश्वास फैला।
कला को अक्सर ‘ग़ैर-ज़रूरी’ समझा जाता है, जबकि वह समाज की चेतना है। सिनेमा, साहित्य और मीडिया ने कई बार ऐसे मुद्दों को मुख्यधारा में लाया, जिन्हें विज्ञान और नीति अकेले नहीं पहुँचा पाए। वहीं जब कला बाज़ार के दबाव में केवल उत्पाद बन जाए, तो उसकी आत्मा खो जाती है। संतुलन ही उसे जीवित रखता है।
आज की समस्या यह नहीं कि हमारे पास विज्ञान नहीं है या वाणिज्य कमजोर है। समस्या यह है कि तीनों को अलग-अलग खाँचों में बाँट दिया गया है। इंजीनियर मानवीय प्रभाव नहीं देखता, व्यापारी सामाजिक जिम्मेदारी से बचता है और कलाकार तकनीक से कट जाता है। यही विभाजन अधूरी व्यवस्था को जन्म देता है।
समाधान किसी एक पक्ष में नहीं, संगम में है। वही शिक्षा प्रासंगिक होगी जो तर्क सिखाए, व्यवहार समझाए और संवेदना जगाए। वही नीति टिकेगी जो गणना, अर्थव्यवस्था और मानवीय अनुभव—तीनों को साथ लेकर चले।
सभ्यताएँ हथियारों या बाज़ार से नहीं, संतुलित सोच से आगे बढ़ती हैं। विज्ञान दिशा देता है, वाणिज्य गति देता है और कला अर्थ देती है। जब तीनों साथ चलते हैं, तभी कोई विचार पूर्ण रूप लेता है—वरना वह या तो प्रयोगशाला में रह जाता है, या बाज़ार में खो जाता है, या संग्रहालय में सिमट जाता है।
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