विकास बनाम संतुलित विकास: कहीं हम अंधी दौड़ में तो नहीं भाग रहे?


 

विकास बनाम संतुलित विकास: कहीं हम अंधी दौड़ में तो नहीं भाग रहे?

आज भारत जिस तेज़ रफ्तार से “विकास” की ओर बढ़ रहा है, वह देखने में आशाजनक लगता है। ऊंची इमारतें, चौड़े एक्सप्रेसवे, चमचमाते मॉल, स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन और डिजिटल इंडिया जैसे शब्द एक आधुनिक राष्ट्र की तस्वीर गढ़ते हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत पर नजर डालें तो यह सवाल खुद-ब-खुद खड़ा हो जाता है—क्या यह विकास वास्तव में आम आदमी के जीवन को बेहतर बना रहा है, या हम सिर्फ आंकड़ों और परियोजनाओं की अंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं?

विकास की चमक और ज़मीन की सच्चाई

देश के बड़े शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बदल रहा है। फ्लाईओवर, मेट्रो, हाईवे और कॉर्पोरेट हब नई पहचान बना रहे हैं। लेकिन इन्हीं शहरों के आसपास झुग्गी बस्तियां फैल रही हैं, पानी की किल्लत बढ़ रही है, हवा जहरीली होती जा रही है और ट्रैफिक जाम आम बात बन चुका है। गांवों में सड़क तो पहुंच गई, लेकिन स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं और खेतों को पानी नहीं मिल रहा। यह विरोधाभास बताता है कि विकास हो तो रहा है, लेकिन उसका संतुलन बिगड़ता जा रहा है।

आर्थिक विकास बनाम सामाजिक न्याय

तेज़ आर्थिक विकास के आंकड़े बताते हैं कि देश की जीडीपी बढ़ रही है, निवेश आ रहा है और स्टार्टअप कल्चर पनप रहा है। पर दूसरी ओर, बेरोजगारी, महंगाई और असमानता भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है। कुछ वर्गों की आय में जबरदस्त उछाल आया है, लेकिन बड़ी आबादी आज भी दो वक्त की रोटी, बेहतर शिक्षा और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं के लिए संघर्ष कर रही है। अगर विकास का फल समाज के एक सीमित हिस्से तक सिमट जाए, तो उसे वास्तविक प्रगति नहीं कहा जा सकता।

पर्यावरण की कीमत पर प्रगति?

तेज़ विकास की सबसे बड़ी कीमत पर्यावरण चुका रहा है। जंगल कट रहे हैं, नदियां प्रदूषित हो रही हैं, भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और जलवायु परिवर्तन के खतरे बढ़ते जा रहे हैं। शहरों में कंक्रीट का जंगल उग रहा है, लेकिन हरियाली सिमटती जा रही है। यह विकास भविष्य की पीढ़ियों से संसाधन उधार लेने जैसा है, जिसे चुकाने की कीमत बेहद भारी होगी। संतुलित विकास का अर्थ है—आज की जरूरतें पूरी करते हुए आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा करना।

शहर बनाम गांव: बढ़ती खाई

तेज़ विकास का केंद्र मुख्यतः शहर बन गए हैं। नतीजा यह कि गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ता जा रहा है। शहरों पर जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है और गांव खाली होते जा रहे हैं। यह असंतुलन सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तीनों स्तरों पर संकट पैदा करता है। अगर गांवों में ही रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों, तो यह पलायन काफी हद तक रोका जा सकता है।

संतुलित विकास का अर्थ क्या है?

संतुलित विकास का मतलब केवल तेज़ी नहीं, बल्कि न्याय, समावेशन और स्थिरता है। इसका अर्थ है कि सड़क और मेट्रो के साथ स्कूल और अस्पताल भी उतने ही जरूरी हों। उद्योग और निवेश के साथ पर्यावरण संरक्षण को बराबरी का महत्व मिले। शहरों के साथ गांवों का भी समान विकास हो। नीतियां ऐसी हों जो केवल आर्थिक आंकड़े न सुधारें, बल्कि आम नागरिक के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाएं।

एक वैकल्पिक दृष्टि: धीमी लेकिन स्थायी प्रगति

हमें यह समझना होगा कि विकास की असली कसौटी उसकी रफ्तार नहीं, उसका असर है। अगर कोई परियोजना लाखों लोगों को बेहतर जीवन देती है, पर्यावरण को सुरक्षित रखती है और सामाजिक संतुलन बनाए रखती है, तो वह भले ही धीमी हो, लेकिन टिकाऊ है। इसके उलट, अगर तेज़ विकास सामाजिक असमानता, पर्यावरण विनाश और असंतोष को जन्म दे, तो वह अंततः खुद अपने बोझ से ढह जाता है।

आज जरूरत इस बात की है कि हम विकास की परिभाषा पर दोबारा विचार करें। क्या हमें सिर्फ ऊंची इमारतों और बड़े आंकड़ों पर गर्व करना है, या एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहां हर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन मिले? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम विकास की अंधी दौड़ में अपनी जड़ों, अपने संसाधनों और अपने भविष्य को पीछे छोड़ते जा रहे हैं? अगर अब भी संतुलन नहीं साधा गया, तो यह दौड़ हमें मंज़िल तक नहीं, बल्कि एक गहरे संकट की ओर ले जा सकती है।

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