भारत की अर्थव्यवस्था : औद्योगिकीकरण और AI की चुनौती


 

भारत को केवल बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, व्यापक उत्पादक क्षमता वाली अर्थव्यवस्था बनना होगा।

“नई विचारधाराओं को विकसित करने में कठिनाई उतनी नहीं है, जितनी पुरानी विचारधाराओं से मुक्त होने में है।” — जॉन मेनार्ड कीन्स के विचार का भावार्थ

शुरुआत: बड़ी अर्थव्यवस्था और छोटे उत्पादक के बीच बढ़ती दूरी

किसी देश की आर्थिक शक्ति का अनुमान उसकी GDP, शेयर बाजार के आकार या दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची से लगाया जा सकता है। लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था की वास्तविक मजबूती को समझने के लिए एक दूसरा सवाल भी पूछना चाहिए—उस देश में उत्पादन करने, तकनीक विकसित करने और आर्थिक अवसरों तक पहुंचने की क्षमता कितने लोगों और संस्थानों के पास है?

भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उसका विशाल घरेलू बाजार, युवा आबादी, डिजिटल भुगतान व्यवस्था और सेवा क्षेत्र उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थान देते हैं। फिर भी इस चमक के पीछे एक ऐसी संरचनात्मक समस्या है, जिसे केवल विकास दर से नहीं समझा जा सकता। देश में करोड़ों लोग ऐसे कामों में लगे हैं जहां आय अनिश्चित है, रोजगार की सामाजिक सुरक्षा सीमित है और छोटे उद्यमों के पास बड़े व्यवसायों से प्रतिस्पर्धा करने के साधन कम हैं।

एक तरफ आधुनिक बैंकिंग, डिजिटल सेवाएं, बड़े औद्योगिक समूह और वैश्विक तकनीकी कंपनियां हैं; दूसरी तरफ छोटी दुकानें, घरेलू उत्पादन, असंगठित श्रमिक, छोटे ठेकेदार और ऐसे सूक्ष्म उद्यम हैं जिनके लिए एक खराब कारोबारी महीना भी गंभीर संकट बन सकता है।

यह अंतर केवल अमीरी और गरीबी का नहीं है। यह आर्थिक शक्ति के वितरण का प्रश्न है।

जब किसी बाजार में कुछ कंपनियों के पास पूंजी, तकनीक, वितरण नेटवर्क और उपभोक्ताओं तक पहुंच का बड़ा हिस्सा जमा हो जाता है, तब नई कंपनियों के लिए प्रवेश कठिन हो सकता है। प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ने पर उपभोक्ता के पास विकल्प घट सकते हैं, छोटे आपूर्तिकर्ताओं की सौदेबाजी की शक्ति कम हो सकती है और नवाचार का दबाव भी कमजोर हो सकता है। हालांकि हर बड़ा व्यवसाय एकाधिकार नहीं होता और बड़े पैमाने पर उत्पादन कई बार लागत घटाने तथा तकनीक में निवेश करने में मदद करता है। असली समस्या आकार नहीं, बल्कि उस आकार से पैदा होने वाली बाजार-शक्ति का जवाबदेह नियंत्रण है।

भारत की बहस को किसी एक उद्योगपति या कंपनी तक सीमित करना इसीलिए पर्याप्त नहीं होगा। प्रश्न यह है कि क्या हमारी नीतियां ऐसी अर्थव्यवस्था बना रही हैं जिसमें नए उद्यम प्रवेश कर सकें, छोटे उत्पादक आगे बढ़ सकें और सफल होने के लिए राजनीतिक संपर्क या पहले से जमा पूंजी ही निर्णायक शर्त न बन जाए।

मध्य: भारत ने सेवा क्षेत्र में उड़ान भरी, लेकिन औद्योगिकीकरण की सीढ़ी अधूरी रह गई

भारत की आर्थिक यात्रा की एक विशेषता यह रही है कि उसने सूचना प्रौद्योगिकी, सॉफ्टवेयर, वित्तीय सेवाओं, दूरसंचार और अन्य सेवाओं में उल्लेखनीय क्षमता विकसित की। इसने विदेशी मुद्रा, कुशल रोजगार और वैश्विक पहचान दिलाई। लेकिन भारत की विकास यात्रा में विनिर्माण क्षेत्र वह व्यापक रोजगार इंजन नहीं बन सका, जिसकी जरूरत कम और मध्यम कौशल वाले करोड़ों श्रमिकों को थी।

अर्थव्यवस्था के तीन व्यापक क्षेत्र—कृषि, उद्योग और सेवाएं—एक-दूसरे के विकल्प नहीं, बल्कि परस्पर जुड़े हिस्से हैं। सामान्यतः कृषि से उद्योग और फिर सेवाओं की ओर श्रम का स्थानांतरण उत्पादकता बढ़ाने का रास्ता बन सकता है। लेकिन यह क्रम हर देश में एक जैसा नहीं होता। भारत में उच्च-मूल्य वाली सेवाओं का विकास हुआ, जबकि बड़े पैमाने पर श्रम को खेती से निकालकर आधुनिक विनिर्माण में लगाने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत कमजोर रही।

इसे केवल गलत नीतियों का परिणाम कहना भी उचित नहीं होगा। भारत ने औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था, कम शुरुआती आय, बुनियादी ढांचे की सीमाओं, कौशल की कमी और घरेलू बाजार की जटिलताओं से शुरुआत की। सूचना प्रौद्योगिकी और अंग्रेजी-आधारित सेवाओं ने ऐसे समय में अवसर दिए जब वैश्विक कंपनियां कम लागत पर तकनीकी सेवाएं तलाश रही थीं। इसलिए सेवा क्षेत्र में मिली सफलता कोई गलती नहीं थी। समस्या यह थी कि उसकी सफलता के साथ पर्याप्त संख्या में उत्पादक औद्योगिक रोजगार नहीं जुड़ पाए।

विश्व बैंक की 2024 की India Country Economic Memorandum रिपोर्ट इस चुनौती को रेखांकित करती है। रिपोर्ट के अनुसार, 2023-24 में कृषि भारत के कुल रोजगार का 45 प्रतिशत से अधिक हिस्सा समेटे हुए थी। इसी अवधि में अनौपचारिक क्षेत्र के उद्यमों में रोजगार का हिस्सा 73.2 प्रतिशत बताया गया, जबकि उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं के लिए रिपोर्ट में दिया गया औसत 32.7 प्रतिशत था। रिपोर्ट यह भी बताती है कि औपचारिक क्षेत्र में नियमित वेतन पाने वाले बहुत से श्रमिकों के पास भी सामाजिक सुरक्षा, सवेतन अवकाश या कानूनी रूप से लागू अनुबंध जैसी सुविधाएं नहीं थीं। विश्व बैंक की रिपोर्ट इसीलिए केवल रोजगार की संख्या नहीं, उसकी गुणवत्ता को भी महत्वपूर्ण मानती है।

इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं कि भारत में सेवा क्षेत्र विफल है। अर्थ यह है कि सेवा क्षेत्र की सफलता अभी पूरी श्रमशक्ति को समान रूप से उत्पादक और सुरक्षित रोजगार देने के लिए पर्याप्त नहीं रही है।

इस अधूरे औद्योगिकीकरण का अंतर चीन से तुलना करने पर और स्पष्ट होता है। रॉयटर्स की 5 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट में विश्व बैंक के आंकड़ों के आधार पर बताया गया कि 2025 में वैश्विक विनिर्माण के मूल्यवर्धन में चीन की हिस्सेदारी लगभग 28 प्रतिशत थी, जबकि भारत की हिस्सेदारी करीब 3 प्रतिशत थी। उसी रिपोर्ट के अनुसार, भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में उत्पादन और निर्यात बढ़ने के बावजूद अनेक महत्वपूर्ण घटकों के लिए चीन पर निर्भरता बनी हुई है। रिपोर्ट पढ़ें।

यह तुलना एक महत्वपूर्ण सबक देती है। उत्पादन का अंतिम उत्पाद अपने देश में तैयार कर लेना और उस उत्पाद के लिए जरूरी तकनीक, मशीनरी, पुर्जे तथा कच्चे माल की घरेलू क्षमता विकसित कर लेना अलग-अलग उपलब्धियां हैं। यदि भारत मोबाइल फोन असेंबल करता है, लेकिन उसके महत्वपूर्ण घटक और उत्पादन संबंधी तकनीक बाहर से आती हैं, तो उत्पादन और रोजगार तो बढ़ सकते हैं, पर घरेलू मूल्यवर्धन तथा तकनीकी आत्मनिर्भरता की संभावनाएं सीमित रह सकती हैं।

चीन की सफलता केवल सस्ती मजदूरी की कहानी भी नहीं है। उसके पीछे लंबे समय तक बुनियादी ढांचे में निवेश, औद्योगिक क्लस्टर, निर्यात क्षमता, आपूर्तिकर्ताओं का नेटवर्क, तकनीकी प्रशिक्षण और बड़े पैमाने पर उत्पादन का अनुभव रहा है। भारत के लिए उसकी नकल करना आसान नहीं, लेकिन यह समझना जरूरी है कि विनिर्माण केवल कारखाना लगाने का नाम नहीं है। उसके साथ हजारों छोटे आपूर्तिकर्ताओं, तकनीशियनों, डिजाइनरों, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और कुशल श्रमिकों का तंत्र भी विकसित करना पड़ता है।

भारत में उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं, बुनियादी ढांचे के विस्तार और आत्मनिर्भरता पर जोर ने कुछ क्षेत्रों में नई संभावनाएं पैदा की हैं। मगर किसी योजना का बजट या किसी क्षेत्र में निवेश की घोषणा अपने आप औद्योगिक सफलता का प्रमाण नहीं है। वास्तविक परीक्षा यह है कि कितनी घरेलू तकनीक विकसित हुई, कितने नए आपूर्तिकर्ता बने, कितना मूल्य देश में जुड़ा और कितने स्थायी, बेहतर वेतन वाले रोजगार पैदा हुए।

इसी बिंदु पर एकाधिकार और आर्थिक अवसरों का प्रश्न भी जुड़ता है। यदि बड़े उद्योगों को पूंजी, बाजार और बुनियादी ढांचे का लाभ मिलता है, लेकिन छोटे उद्यमों को सस्ता ऋण, तकनीकी सहायता और बाजार तक पहुंच नहीं मिलती, तो आर्थिक विकास के बावजूद उत्पादक क्षमता कुछ बड़े केंद्रों में सिमट सकती है। दूसरी ओर, यदि बड़े उद्योग घरेलू आपूर्तिकर्ताओं का नेटवर्क विकसित करते हैं, तकनीक साझा करते हैं और प्रतिस्पर्धा के लिए जगह छोड़ते हैं, तो उनका विस्तार व्यापक औद्योगिकीकरण का माध्यम बन सकता है।

इसलिए सरकार की औद्योगिक नीति का मूल्यांकन केवल यह देखकर नहीं होना चाहिए कि उसने निवेश आकर्षित किया या नहीं। यह भी देखना चाहिए कि उस निवेश से कितनी नई कंपनियां खड़ी हुईं और आर्थिक शक्ति कितनी व्यापक हुई।

अगली चुनौती: AI केवल तकनीक नहीं, उत्पादन और रोजगार की नई व्यवस्था है

जब भारत अपने औद्योगिकीकरण की पुरानी चुनौती से जूझ रहा है, तभी कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI एक नई वैश्विक प्रतिस्पर्धा पैदा कर रही है। इस बार मुकाबला केवल सॉफ्टवेयर सेवाएं बेचने का नहीं है। इसमें अत्याधुनिक चिप, कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा सेंटर, ऊर्जा, शोध संस्थान, प्रतिभा, बड़े AI मॉडल और उन्हें वास्तविक उद्योगों में लागू करने की क्षमता शामिल है।

अमेरिका ने निजी निवेश, तकनीकी कंपनियों, विश्वविद्यालयों, शोध और कंप्यूटिंग अवसंरचना के मेल से AI में मजबूत स्थिति बनाई है। चीन ने अपने बड़े औद्योगिक आधार, शोध, घरेलू तकनीकी कंपनियों और बड़े बाजार का इस्तेमाल किया है। दोनों की रणनीतियां अलग हैं, लेकिन एक बात समान है—वे AI को केवल किसी दूसरे देश से खरीदी जाने वाली सुविधा नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक क्षमता के रूप में देखते हैं।

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के मानव-केंद्रित AI संस्थान की AI Index Report 2026 के अनुसार, 2025 में अमेरिका में निजी AI निवेश लगभग 285.9 अरब डॉलर था, जबकि चीन के लिए यह आंकड़ा लगभग 12.4 अरब डॉलर बताया गया। हालांकि रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि केवल निजी निवेश से चीन के कुल AI निवेश का पूरा अनुमान नहीं मिलता, क्योंकि वहां सरकारी मार्गदर्शन वाले फंड की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक कॉर्पोरेट AI निवेश 2025 में तेजी से बढ़ा। Stanford AI Index 2026।

भारत के सामने यहां दोहरी चुनौती है। एक ओर उसके पास बड़ा डिजिटल बाजार, तकनीकी पेशेवर, सॉफ्टवेयर उद्योग और विशाल भाषाई विविधता है। दूसरी ओर, अत्याधुनिक AI मॉडल, उन्नत चिप और बड़े पैमाने की कंप्यूटिंग क्षमता के विकास में उसकी स्थिति अमेरिका और चीन जैसी नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत AI में कोई भूमिका नहीं निभा सकता। बल्कि सवाल यह है कि वह अपनी मौजूदा ताकत को किस तरह तकनीकी स्वामित्व और व्यापक उत्पादकता में बदलता है।

भारत ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना—जैसे आधार, UPI और डिजिटल सेवा वितरण—के क्षेत्र में महत्वपूर्ण क्षमता विकसित की है। लेकिन डिजिटल भुगतान में सफलता और वैश्विक स्तर के AI प्लेटफॉर्म विकसित करने की क्षमता अलग-अलग बातें हैं। सोशल मीडिया में भी भारत का बड़ा उपयोगकर्ता आधार है, मगर दुनिया के सबसे प्रभावशाली सामाजिक नेटवर्क और डिजिटल विज्ञापन मंचों का स्वामित्व मुख्यतः विदेशी कंपनियों के पास है। उपयोगकर्ताओं की संख्या बड़ी होना और तकनीकी मंच का मालिक होना एक ही बात नहीं है।

यही अंतर AI में भी निर्णायक होगा। यदि भारतीय कंपनियां केवल विदेशी मॉडल का उपयोग करके सेवाएं बेचती हैं, तो उन्हें लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि वे भारतीय भाषाओं, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, कानून, छोटे उद्योगों और सार्वजनिक सेवाओं के लिए भरोसेमंद AI समाधान विकसित करती हैं, तो देश में नई तकनीकी क्षमता पैदा हो सकती है। इसके लिए केवल ऐप बनाना पर्याप्त नहीं होगा; शोध, डेटा की गुणवत्ता, सुरक्षित कंप्यूटिंग, प्रतिभा और वास्तविक उद्योगों के साथ सहयोग भी चाहिए।

क्या AI का बुलबुला फूटने वाला है?

AI में निवेश की तेज वृद्धि के साथ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या बाजार जरूरत से ज्यादा उम्मीदें लगा रहा है। बड़ी कंपनियां डेटा सेंटर, चिप और कंप्यूटिंग क्षमता पर भारी खर्च कर रही हैं। यदि इन निवेशों से मिलने वाली वास्तविक आय और उत्पादकता अपेक्षा से कम रही, तो कुछ कंपनियों के मूल्यांकन में गिरावट और निवेश में कमी संभव है।

जनवरी 2025 में चीनी कंपनी DeepSeek के कम लागत वाले मॉडल ने बाजार को यह सोचने पर मजबूर किया कि अत्याधुनिक AI विकसित करने के लिए हर बार सबसे महंगी कंप्यूटिंग व्यवस्था जरूरी है या नहीं। IMF की 2025 की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट ने इस घटनाक्रम के बाद तकनीकी शेयरों में आई प्रतिक्रिया और AI निवेश से जुड़ी बाजार अपेक्षाओं की संवेदनशीलता का उल्लेख किया। IMF Global Financial Stability Report।

लेकिन AI के संभावित बुलबुले पर चर्चा का अर्थ यह नहीं कि AI तकनीक समाप्त हो जाएगी। इंटरनेट के शुरुआती दौर में भी अत्यधिक मूल्यांकन और असफल कंपनियां थीं, फिर भी इंटरनेट ने अर्थव्यवस्था को बदल दिया। संभव है कि AI में भी कुछ कंपनियां असफल हों, कुछ निवेश व्यर्थ साबित हों और तकनीक की वास्तविक उपयोगिता अपेक्षा से अधिक समय ले। साथ ही यह भी संभव है कि कम लागत वाले मॉडल और बेहतर उपकरण AI को और व्यापक बना दें।

भारत को इस अनिश्चितता में दो अतियों से बचना चाहिए। एक ओर हर AI घोषणा को भविष्य की निश्चित सफलता मानकर सार्वजनिक संसाधन खर्च करना गलत होगा। दूसरी ओर, संभावित बाजार गिरावट के डर से शोध, प्रशिक्षण और घरेलू क्षमता विकसित करने में देर करना भी नुकसानदेह होगा।

AI को लेकर सबसे जरूरी सवाल यह है कि वह भारत में वास्तविक समस्याएं कितनी हल करता है। क्या वह छोटे कारखानों की उत्पादकता बढ़ाता है? क्या किसान को बेहतर जानकारी मिलती है? क्या भारतीय भाषाओं में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होती हैं? क्या छोटे व्यवसाय कम लागत में लेखांकन, विपणन और आपूर्ति प्रबंधन कर पाते हैं? और क्या नई तकनीक से पैदा हुई उत्पादकता का लाभ कर्मचारियों की आय तथा बेहतर कामकाजी परिस्थितियों तक पहुंचता है?

यदि इन सवालों के जवाब सकारात्मक हैं, तो AI भारत के लिए अवसर है। यदि उसका लाभ कुछ कंपनियों और पूंजी मालिकों तक सीमित रह जाता है, जबकि बड़ी संख्या में श्रमिकों की सौदेबाजी की शक्ति घटती है, तो तकनीकी प्रगति के साथ आर्थिक असमानता भी बढ़ सकती है।

समाधान: बड़े उद्योगों से प्रतिस्पर्धा नहीं, उत्पादक क्षमता का विस्तार

भारत की दिशा तय करने के लिए सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि बड़े उद्योग और छोटे उद्यम एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। समस्या तब पैदा होती है जब बाजार में प्रवेश की बाधाएं इतनी ऊंची हो जाएं कि नए प्रतिस्पर्धी टिक ही न सकें, या नीतिगत लाभ कुछ स्थापित कंपनियों के लिए ही अधिक सुलभ हों।

इसलिए प्रतिस्पर्धा नीति को मजबूत करना जरूरी है। बाजार में विलय, अधिग्रहण, डिजिटल प्लेटफॉर्म की शक्ति, डेटा तक पहुंच और छोटे आपूर्तिकर्ताओं के साथ व्यवहार पर प्रभावी निगरानी होनी चाहिए। प्रतिस्पर्धा आयोग को पर्याप्त विशेषज्ञता, स्वतंत्र कार्यक्षमता और समयबद्ध प्रक्रिया मिलनी चाहिए। साथ ही, नियमन ऐसा हो जो वास्तविक नवाचार और उत्पादक निवेश को बाधित किए बिना अनुचित बाजार-शक्ति पर रोक लगाए।

दूसरा, भारत को श्रम-प्रधान विनिर्माण पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। कपड़ा, जूते, खाद्य प्रसंस्करण, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा उपकरण और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने के साथ छोटे आपूर्तिकर्ताओं के लिए तकनीकी प्रशिक्षण, साझा परीक्षण सुविधाएं, सस्ता ऋण और निर्यात सहायता उपलब्ध करानी चाहिए। औद्योगिक क्लस्टर तभी सफल होंगे जब उनके आसपास स्थानीय उद्यमों और कुशल श्रमिकों का नेटवर्क भी विकसित होगा।

तीसरा, रोजगार की गुणवत्ता को औद्योगिक नीति का स्पष्ट लक्ष्य बनाया जाना चाहिए। कितने रोजगार बने, यह जरूरी है; लेकिन उनके वेतन, सामाजिक सुरक्षा, कौशल-विकास और स्थायित्व को भी मापा जाना चाहिए। असंगठित श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा, छोटे व्यवसायों के लिए सरल अनुपालन और श्रमिकों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था आर्थिक विकास को व्यापक आधार दे सकती है।

चौथा, AI के क्षेत्र में भारत को केवल विदेशी तकनीक का उपभोक्ता नहीं रहना चाहिए। इसके लिए भारतीय भाषाओं के डेटा, सार्वजनिक शोध संस्थानों, विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप, उद्योगों और सरकारी सेवाओं के बीच सहयोग बढ़ाना होगा। हर क्षेत्र में सबसे बड़ा मॉडल बनाना जरूरी नहीं है। कई बार कम लागत वाले, छोटे और किसी विशेष काम के लिए प्रशिक्षित मॉडल भारतीय जरूरतों के लिए ज्यादा उपयोगी होंगे। सार्वजनिक धन से बने AI संसाधनों के इस्तेमाल में पारदर्शिता, सुरक्षा और जवाबदेही भी अनिवार्य होनी चाहिए।

पांचवां, भारत को AI के संभावित रोजगार प्रभावों के लिए पहले से तैयारी करनी होगी। जिन कामों में स्वचालन की संभावना है, वहां कौशल उन्नयन, आजीवन सीखने और कर्मचारियों को नई भूमिकाओं में जाने के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है। उत्पादकता बढ़ने का अर्थ केवल कम कर्मचारियों से ज्यादा काम लेना नहीं होना चाहिए; उसका लाभ बेहतर वेतन, कम लागत, बेहतर सेवाओं और नए रोजगार के रूप में भी सामने आना चाहिए।

अंततः आर्थिक विकास का लक्ष्य केवल वैश्विक GDP रैंकिंग में ऊपर जाना नहीं हो सकता। भारत को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें नई कंपनियां पैदा हों, छोटे उद्यम बढ़ें, श्रमिकों की उत्पादकता और आय सुधरे तथा तकनीक का स्वामित्व और लाभ व्यापक समाज तक पहुंचे।

अंत: भारत को बाजार चाहिए, लेकिन ऐसा बाजार जिसमें प्रवेश का रास्ता खुला हो

भारत की अर्थव्यवस्था के सामने आज एक साथ तीन प्रश्न हैं—क्या वह पर्याप्त रोजगार पैदा कर सकती है, क्या वह विनिर्माण में अपनी घरेलू क्षमता बढ़ा सकती है और क्या वह AI के युग में तकनीकी निर्भरता से आगे बढ़कर नवाचार का केंद्र बन सकती है?

इन तीनों प्रश्नों का उत्तर केवल बड़े निवेश, सरकारी घोषणाओं या GDP वृद्धि से नहीं मिलेगा। उसके लिए संस्थागत क्षमता, प्रतिस्पर्धा, शिक्षा, शोध, कुशल श्रम और छोटे उद्यमों को आगे बढ़ाने वाली नीतियों की जरूरत है।

भारत के पास बड़ा बाजार है, डिजिटल अवसंरचना है, उद्यमशीलता की क्षमता है और दुनिया के साथ जुड़ने का अनुभव है। लेकिन इन ताकतों को स्थायी आर्थिक शक्ति में बदलने के लिए उसे अपने औद्योगिकीकरण की अधूरी यात्रा पूरी करनी होगी। उसे ऐसी कंपनियां बनानी होंगी जो दुनिया के लिए तकनीक और उत्पाद विकसित करें, और ऐसी संस्थाएं भी जो सुनिश्चित करें कि आर्थिक शक्ति कुछ हाथों में सिमटने के बजाय समाज की व्यापक उत्पादक क्षमता को बढ़ाए।

AI के दौर में यह चुनौती और बड़ी हो गई है। हो सकता है कि आज के कुछ AI निवेश अपेक्षित लाभ न दें; हो सकता है कि बाजार में सुधार आए और कई कंपनियां पीछे छूट जाएं। लेकिन तकनीकी परिवर्तन की दिशा को केवल बाजार के उतार-चढ़ाव से नहीं मापा जा सकता। असली प्रश्न यह है कि भारत इस बदलाव से क्या सीखता है और अपनी क्षमता कितनी बढ़ाता है।

भारत को न तो हर विदेशी तकनीक पर निर्भर रहना चाहिए और न ही आत्मनिर्भरता के नाम पर वैश्विक सहयोग से दूरी बनानी चाहिए। उसे ऐसी नीति चाहिए जो प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करे, घरेलू अनुसंधान को बढ़ाए, श्रमिकों को सुरक्षा दे और छोटे उद्यमों को बाजार में टिकने का अवसर प्रदान करे।

किसी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल यह नहीं कि उसके पास कुछ विश्वस्तरीय कंपनियां हैं; बल्कि यह है कि वह लगातार नई विश्वस्तरीय कंपनियां पैदा कर सके, करोड़ों लोगों को उत्पादक रोजगार दे सके और अपनी तकनीकी प्रगति का लाभ व्यापक समाज तक पहुंचा सके।

भारत की अगली छलांग इसी कसौटी पर तय होगी—वह केवल एक बड़ा बाजार बनकर रह जाता है, या अपनी श्रमशक्ति, उद्यमशीलता और तकनीकी क्षमता के सहारे दुनिया का एक महत्वपूर्ण उत्पादक और नवाचार केंद्र बनता है।

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