मजदूर, युवा और किसान: दुनिया में किस देश ने आम आदमी की अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाया?
आर्थिक विकास का असली पैमाना जीडीपी नहीं, वह जीवन है जो एक मजदूर, एक युवा और एक किसान जी रहा है
किसी देश की आर्थिक सफलता को मापने के लिए हमारे पास जीडीपी, शेयर बाजार, विदेशी निवेश, प्रति व्यक्ति आय और निर्यात जैसे दर्जनों आंकड़े हैं। लेकिन आम आदमी की जिंदगी का एक अधिक सीधा सवाल भी हो सकता है—वहां मजदूर कितना सुरक्षित है, युवा को काम और भविष्य की कितनी संभावना दिखाई देती है और किसान अपनी जमीन से सम्मानजनक आय कमा पा रहा है या नहीं?
यही तीन सवाल दुनिया की अर्थव्यवस्था को एक अलग नजर से देखने का रास्ता खोलते हैं।
मजदूर को केवल रोजगार नहीं चाहिए; उसे उचित मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और काम की गरिमा चाहिए। युवा को केवल डिग्री नहीं चाहिए; उसे ऐसा श्रम बाजार चाहिए जिसमें शिक्षा के बाद आर्थिक स्वतंत्रता संभव हो। किसान को केवल फसल का उत्पादन नहीं करना; उसे बाजार, तकनीक, जोखिम से सुरक्षा और अपनी मेहनत का पर्याप्त प्रतिफल भी चाहिए।
इस कसौटी पर दुनिया की तस्वीर दिलचस्प है।
पहला आंकड़ा ही भ्रम तोड़ देता है
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के 2026 के आकलन के अनुसार दुनिया में बेरोजगारी दर लगभग 4.9 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। देखने में यह संख्या बहुत बड़ी समस्या जैसी नहीं लगती। लेकिन इसी आंकड़े के पीछे एक दूसरी दुनिया छिपी है।
लगभग 2.1 अरब लोग अनौपचारिक रोजगार में हैं और करीब 30 करोड़ श्रमिक अत्यंत गरीबी की स्थिति में काम कर रहे हैं। यानी रोजगार होना और अच्छा रोजगार होना दो अलग बातें हैं। (International Labour Organization)
युवा स्थिति को देखें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। 2023 में दुनिया में 15–24 वर्ष आयु के लगभग 6.49 करोड़ युवा बेरोजगार थे। वैश्विक युवा बेरोजगारी दर करीब 13 प्रतिशत थी। (International Labour Organization)
और 2026 के ILO आकलन में लगभग 20 प्रतिशत युवा—करीब 26 करोड़ लोग—न रोजगार में हैं, न शिक्षा या प्रशिक्षण में। (International Labour Organization)
इसलिए केवल यह कहना कि “देश में बेरोजगारी कम है”, पूरी कहानी नहीं बताता।
युवा: यहां विकसित देशों की बढ़त दिखाई देती है
World Bank के नवीनतम उपलब्ध ILO-आधारित आंकड़ों में 2024 के लिए नीदरलैंड में NEET यानी न रोजगार, न शिक्षा, न प्रशिक्षण वाले युवाओं की हिस्सेदारी करीब 4.1 प्रतिशत, आइसलैंड में 4 प्रतिशत, डेनमार्क में 6.9 प्रतिशत, जर्मनी में 7.6 प्रतिशत और ऑस्ट्रेलिया में 8.5 प्रतिशत थी।
इसके विपरीत भारत में 2025 का यही आंकड़ा 25.6 प्रतिशत था। (World Bank Gender Data Portal)
यह तुलना एक महत्वपूर्ण बात बताती है।
समस्या केवल “नौकरी नहीं है” की नहीं है। समस्या यह भी है कि शिक्षा से रोजगार तक जाने का रास्ता कितना मजबूत है।
भारत में बड़ी युवा आबादी एक संभावित आर्थिक ताकत है, लेकिन यदि युवा लंबे समय तक पढ़ाई, बेरोजगारी, अस्थायी काम और प्रतियोगी परीक्षाओं के बीच फंसा रहता है तो जनसांख्यिकीय लाभ अपने आप आर्थिक लाभ में नहीं बदलता।
यूरोप के कुछ देशों में भी बेरोजगारी और युवा असुरक्षा खत्म नहीं हुई है। लेकिन शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के बीच संस्थागत पुल अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई देता है।
मजदूर: केवल वेतन नहीं, सुरक्षा भी मायने रखती है
मजदूर की स्थिति का अंतर देशों के बीच समझने के लिए सिर्फ मासिक वेतन की तुलना पर्याप्त नहीं है।
एक मजदूर को देखें:
मजदूरी + काम के घंटे + रोजगार की स्थिरता + स्वास्थ्य सुरक्षा + बेरोजगारी सुरक्षा + पेंशन + छुट्टी + कानूनी संरक्षण
इन सबको जोड़ने पर तस्वीर बदलती है।
OECD के 2025 Employment Outlook के अनुसार OECD देशों में 2025 की पहली तिमाही में औसत रोजगार दर 72.1 प्रतिशत थी और 37 देशों में से 33 में वास्तविक मजदूरी साल-दर-साल बढ़ रही थी। हालांकि 18 देशों में वास्तविक मजदूरी अभी भी 2021 की पहली तिमाही के स्तर से नीचे थी। (OECD)
यानी अमीर देशों में भी मजदूर की समस्या समाप्त नहीं हुई है।
महंगाई, आवास की लागत, अस्थायी रोजगार और तकनीकी बदलाव वहां भी दबाव बना रहे हैं। फर्क यह है कि औपचारिक संस्थाएं अक्सर इस झटके को absorb करने में अधिक सक्षम हैं।
दूसरी ओर ILO के अनुसार दुनिया के 57.8 प्रतिशत श्रमिक 2024 में अनौपचारिक रोजगार में थे। ऐसे रोजगार में आय, काम के घंटे, सुरक्षा और कानूनी संरक्षण की स्थिति औपचारिक रोजगार की तुलना में कमजोर हो सकती है। (International Labour Organization)
यहीं से भारत जैसे देशों की चुनौती समझ में आती है।
किसान: सबसे कठिन तुलना
किसान की स्थिति शायद इन तीनों में सबसे जटिल है।
क्योंकि किसान एक साथ मजदूर भी है, उत्पादक भी, छोटा उद्यमी भी और मौसम तथा बाजार के जोखिम का वहन करने वाला व्यक्ति भी।
FAO के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अनेक देशों में छोटे खाद्य उत्पादक बड़े उत्पादकों की तुलना में काफी कम आय अर्जित करते हैं। कई देशों में छोटे उत्पादकों की वार्षिक कृषि आय 1,500 अमेरिकी डॉलर से भी कम रही है। औसतन छोटे उत्पादकों की आय गैर-छोटे उत्पादकों की आय के आधे से भी कम पाई गई है। (FAOHome)
फिर भी दुनिया के खाद्य तंत्र में छोटे किसान को कम करके नहीं देखा जा सकता।
FAO के 2025 के एक बड़े अध्ययन ने 77 देशों और 120 खाद्य फसलों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसके अनुसार 2 हेक्टेयर से कम जमीन वाले छोटे किसान दुनिया की 9–16 प्रतिशत कैलोरी का उत्पादन करते हैं। निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में उनकी भूमिका और बड़ी है—वे राष्ट्रीय खाद्य उत्पादन का लगभग 60 प्रतिशत तक योगदान करते हैं। (FAOHome)
अर्थात किसान आर्थिक रूप से कमजोर हो सकता है, लेकिन खाद्य व्यवस्था में उसकी भूमिका कमजोर नहीं है।
फिर किसान के लिए कौन-सा मॉडल काम करता है?
यूरोप में कृषि को केवल बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा गया है।
Eurostat के 2024 आंकड़ों में कृषि क्षेत्र की प्रति Annual Work Unit वास्तविक factor income डेनमार्क में लगभग 54 हजार यूरो, नीदरलैंड में करीब 52 हजार यूरो और जर्मनी में लगभग 42 हजार यूरो थी। EU औसत लगभग 20 हजार यूरो था। (European Commission)
लेकिन यहां सावधानी जरूरी है। यह सीधे-सीधे “किसान की जेब में आने वाली आय” नहीं है। Eurostat खुद चेतावनी देता है कि देशों में पूर्णकालिक काम के घंटों की परिभाषा और कृषि की पूंजी-श्रम संरचना अलग होती है। इसलिए इन आंकड़ों को सीधे भारतीय किसान की मासिक आय से तुलना करना उचित नहीं होगा। (European Commission)
फिर भी इससे एक महत्वपूर्ण आर्थिक सिद्धांत सामने आता है—कृषि को उत्पादकता, बाजार और संस्थागत सहायता के साथ जोड़ा जाए तो किसान की आर्थिक स्थिति केवल मौसम पर निर्भर नहीं रहती।
नॉर्वे इसका एक अलग उदाहरण है। OECD के अनुसार 2022–24 में वहां Producer Support Estimate सकल farm receipts का औसतन 47 प्रतिशत था। कृषि के लिए बाजार संरक्षण और सरकारी समर्थन वहां की कृषि व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। (OECD)
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। इतना संरक्षण उपभोक्ता कीमतों, सरकारी खर्च और व्यापार पर भी प्रभाव डाल सकता है। इसलिए “किसानों को सबसे ज्यादा सब्सिडी” को अपने आप में आदर्श मॉडल मानना भी उचित नहीं होगा।
तो आखिर कौन-सा देश सबसे बेहतर है?
यहीं इस पूरी तुलना का सबसे दिलचस्प निष्कर्ष सामने आता है।
कोई एक देश ऐसा नहीं दिखाई देता जिसे मजदूर, युवा और किसान—तीनों के लिए बिना किसी शर्त के दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मॉडल कहा जा सके।
युवा रोजगार के संकेतकों में नीदरलैंड, आइसलैंड, डेनमार्क, जर्मनी जैसे देशों के आंकड़े मजबूत दिखाई देते हैं। (World Bank Gender Data Portal)
कृषि आय और कृषि संस्थागत समर्थन को देखें तो डेनमार्क, नीदरलैंड, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में अलग-अलग प्रकार के मजबूत तंत्र दिखाई देते हैं। (European Commission)
मजदूर के लिए OECD देशों में उच्च रोजगार, वास्तविक मजदूरी और औपचारिक सामाजिक सुरक्षा का संयोजन कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अलग स्तर की सुरक्षा देता है। लेकिन वहां भी महंगाई और वास्तविक मजदूरी की समस्या खत्म नहीं हुई है। (OECD)
इसलिए “एक विजेता देश” खोजने के बजाय तीन अलग-अलग सबक निकालना ज्यादा ईमानदार होगा।
युवा के लिए—शिक्षा से रोजगार तक सीधा रास्ता।
मजदूर के लिए—नौकरी के साथ सामाजिक सुरक्षा।
किसान के लिए—उत्पादन के साथ बाजार और जोखिम सुरक्षा।
भारत की असली चुनौती
भारत की समस्या यह नहीं है कि उसके पास युवा नहीं हैं, किसान नहीं हैं या श्रमिक नहीं हैं।
समस्या यह है कि इन तीनों की आर्थिक क्षमता को उत्पादक, सुरक्षित और सम्मानजनक आय में बदलने वाली संस्थागत श्रृंखला अभी पूरी तरह मजबूत नहीं है।
एक युवा डिग्री लेकर वर्षों तक रोजगार खोजता रहे, किसान फसल पैदा करके भी बाजार और मौसम के जोखिम में रहे और मजदूर रोजगार मिलने के बाद भी बीमारी, दुर्घटना या बेरोजगारी के समय आर्थिक रूप से अकेला पड़ जाए—तो केवल GDP बढ़ने से इन तीनों की जिंदगी अपने आप नहीं बदलती।
ILO का 2026 का निष्कर्ष भी इसी विरोधाभास की ओर संकेत करता है: वैश्विक रोजगार बाजार स्थिर दिखाई दे रहा है, लेकिन job quality में सुधार रुक गया है और असमानताएं बनी हुई हैं। (International Labour Organization)
आर्थिक विकास का अगला चरण शायद यही होना चाहिए कि सवाल बदले जाएं।
कितनी नौकरियां पैदा हुईं? से आगे बढ़कर—कितनी अच्छी नौकरियां पैदा हुईं?
कितना कृषि उत्पादन हुआ? से आगे बढ़कर—किसान की वास्तविक आय कितनी बढ़ी?
कितने युवा शिक्षित हुए? से आगे बढ़कर—कितने युवा आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुए?
और शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल—
देश की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी हुई, से ज्यादा जरूरी यह है कि उसमें काम करने वाले इंसान की जिंदगी कितनी सुरक्षित हुई।
यही वह जगह है जहां “विकास” एक आर्थिक आंकड़े से निकलकर सामाजिक न्याय का प्रश्न बन जाता है।
इस विषय को और गहराई से समझने के लिए 5 महत्वपूर्ण पुस्तकें
1. The Great Transformation — Karl Polanyi
बाजार, समाज और श्रम के संबंध को समझने वाली क्लासिक पुस्तक। यह बताती है कि जब श्रम, जमीन और समाज को केवल बाजार की वस्तु मान लिया जाता है तो उसके सामाजिक परिणाम क्या हो सकते हैं।
2. The Precariat: The New Dangerous Class — Guy Standing
अस्थायी नौकरी, gig work, अनिश्चित आय और सामाजिक सुरक्षा के कमजोर होने से पैदा हो रहे नए श्रमिक वर्ग को समझने के लिए महत्वपूर्ण पुस्तक।
3. The Unsettling of America: Culture & Agriculture — Wendell Berry
कृषि को केवल उत्पादन और मुनाफे की समस्या न मानकर जमीन, समुदाय, किसान और संस्कृति से जोड़ती है। किसान के प्रश्न पर आर्थिक से ज्यादा सभ्यतागत दृष्टि देती है।
4. Capital in the Twenty-First Century — Thomas Piketty
आय और संपत्ति की असमानता को ऐतिहासिक आंकड़ों के जरिए समझने वाली चर्चित पुस्तक। मजदूर और पूंजी के बीच बढ़ते अंतर को समझने में उपयोगी।
5. The Tyranny of Merit — Michael J. Sandel
युवा, शिक्षा, मेरिट और सामाजिक असमानता के संबंध पर महत्वपूर्ण बहस खड़ी करती है। यह सवाल पूछती है कि क्या डिग्री और व्यक्तिगत सफलता को पूरी तरह व्यक्ति की योग्यता मान लेना उचित है, जब शुरुआती अवसर बराबर न हों।
अंतिम बात
इन पांचों पुस्तकों को एक साथ पढ़ने पर एक साझा सवाल उभरता है—अर्थव्यवस्था आखिर किसके लिए है?
यदि उत्पादन बढ़ रहा है लेकिन किसान की आय असुरक्षित है, रोजगार बढ़ रहा है लेकिन मजदूर असुरक्षित है और शिक्षा बढ़ रही है लेकिन युवा आर्थिक स्वतंत्रता तक नहीं पहुंच पा रहा, तो विकास की कहानी अधूरी है।
दुनिया के अलग-अलग देशों ने इन समस्याओं के अलग-अलग समाधान खोजे हैं। भारत के लिए चुनौती किसी एक देश की नकल करना नहीं, बल्कि मजदूर की सुरक्षा, युवा की गतिशीलता और किसान की आर्थिक स्वतंत्रता—इन तीनों को एक ही विकास मॉडल में जोड़ना है।
इस लेख में जानबूझकर “फलां देश नंबर-1 है” जैसी रैंकिंग नहीं रखी है, क्योंकि उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय संकेतक तीनों समूहों के लिए अलग-अलग चीजें मापते हैं। इससे लेख की आलोचनात्मक धार भी रहती है और आंकड़ों के स्तर पर अतिशयोक्ति से बचता है।
Comments
Post a Comment